Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वमिन्द्रजालमसन्मयम् ।
त्यजतीति विनिश्चित्य दिनानुदिनमेषणाः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत््वज्ञानी किस सार का ग्रहण करता है, यदि कड यह पूछे, तो इसका उत्तर यह हैं कि वह
सबसे पहले जयत् को निथ्या देखता हैं उसके बाद क्रमशः समस्त अपनी इच्छाओं का त्यायकर
देता है, यह कहते हैं /
सर्वप्रथम वह सारग्राही महात्मा यह सारा विश्व इन्द्रजाल के समान असन्मय एकमात्र भ्रान्तिरूप
ही है, इस प्रकार का निश्चय करके दिन-प्रति दिन अपनी इच्छाओं का त्याग करता जाता है