Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
स्वरूपमीदृशं तस्य को वेत्ति मुनिनायक ।
वद सत्यमसत्यं वा भवत्यज्ञो ह्यपीदृशः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त लक्षणों से तत्वज्ञानी का परिचय होना बड़ा कठिन है / क्योकि मूर्ख दाम्भिक,
कंचक; तपसवी में भी कलात् सम्पादित हुए इन लक्षणों का दर्शन हो सकता हैं, यों श्रीरमचन्द्रजी
आशंका करते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, तत्त्वज्ञानी का ऐसा स्वरूप सत्य है या असत्य इसको
कौन जान सकता है ? यह कहिये, क्योकि आपके द्वारा कहे गये लक्षणों से युक्त दाम्भिक अज्ञानी
पुरुष भी इस लोक में देख पड़ता है