Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
शीतातपादिदुःखानि निजदेहगतान्यपि ।
अन्यदेहगतानीव ज्ञः पश्यत्यवहेलया ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्यश्वात् शीतोष्णादि इन्द्र की सहिष्णुतारूप यानी सर्दी-यर्मी का जो सहन करना है. तद्रू
सार को ग्रहण करता हैं, यह कहते हैं /
अपने शरीर में प्राप्त भी शीत, ताप आदि दुःखों को ज्ञानी पुरुष अन्य देहस्थ के समान
अनादर से देखता है