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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

कश्चिद्भिक्षाचराचारः कश्चिदेकान्ततापसः । कश्चिन्मौनव्रतधरः कश्चिद्ध्यानपरायणः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई भिखमंगों के आचरण से युक्त हो पर्यटन करता है, तो कोई एकान्त में तपस्वी बनकर रहता है, तो कोई मौनव्रतधारी होकर रहता है और कोई महात्मा तो ब्रह्मध्यान में ही परायण रहता है