Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
चिरं कल्लोलवलितः सुमना जलधौ भ्रमे ।
परं पारमुपागत्य परां विश्रान्तिमेति सः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
उती समय वह विरकाल से पीछे पड़े रागादि विकषेपरूप दुख से मुक्त होकर परम विश्रान्ति
प्राप्त कर लेता हैं, यह कहते हैं ।
भ्रमरूपी सागर में राग, द्वेष आदि लहरों से चिरकाल तक विक्षिप्त (लथेड़ा गया) वह निर्मल
मनवाला पुरुष ज्ञान द्वारा परब्रह्म को प्राप्त होकर परम विश्रान्ति को प्राप्त करता है