Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

नैव तस्य कृतेनार्थो नाऽकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानी का इस संसार में न तो कर्म से ही कोई प्रयोजन है और न कर्म के अभाव से कोई प्रत्यवायप्राप्ति रूप अनर्थ है तथा ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों में इस विवेकी का, किसी आत्मप्रयोजन की अपेक्षा करके, आश्रय लेने योग्य कोई भी नहीं है