Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 7

छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्ग अनर्थ आदि में काम आदि के द्वारा होनेवाली रम्यतायुक्त अर्थरूपता अज्ञान की विभूतियाँ हैं इसका सविस्तार वर्णन ।

62 verse-groups

  1. Verse 1सबसे पहले महाराज विष्ठजी सम्पूर्ण विवेक का अपहरण करनेवाली तथा तत्क्षण अनर्थ गर्तो में गिर…
  2. Verse 2कपोल-तलरूप दोला से दोलित स्त्रियों की दृष्टिर्यो सुवर्णमय कमल के कोश में अवस्थित चपल भ्रम…
  3. Verse 3वसन्तकाल में वनखण्डों में, वृक्षों में और भूमि में कामदेव के अनुचर की नाई कामियों को मद उ…
  4. Verse 4कच्चे मांस का भक्षण करनेवाले गीध, गीदड, कुत्ता आदि के कवल के (कौर के) योग्य अंगोवाली सित्…
  5. Verse 5वास्तव में लहू या पीव (मवाद) की दुर्गन्ध ही जिसकी सुगन्ध है, ऐसी स्त्रयो की स्तन श्रेणी ज…
  6. Verse 6लार से भीगा ओष्ठनामक मांस का टुकड़ा जो रसायन, अमृत, मधु, विम्ब ओर मद्य के साथ उपमा दिया ज…
  7. Verse 7प्रत्येक का विभाग कर यदि देखा जाय, तो छोटे-छोटे पोर के सदृश आकारवाले जो भुजात्मक क्रूर हड…
  8. Verse 8इसी प्रकार कदली के स्तम्भयुगलरूपी जंघाओं की सामग्री से युक्त सुन्दर रमणियों के द्वारा धार…
  9. Verse 9आरम्भ-आरम्भ में मन्द लोगों को अत्यन्त मधुर लगनेवाली अथवा ऊपर-ऊपर से थोड़ी मोटी, व्ययकाल म…
  10. Verse 10जो बुद्धि दुःख प्राप्त करती है, जो सुख हजारों शाखाओं के रूपमे विभक्त हो जाता है तथा जो अन…
  11. Verse 11जब अनेक तरह की लक्षिमयाँ अज्ञान की ही विभूतियाँ हैं, तब उक्त लक्षिमयों के उत्पादक काम्य क…
  12. Verse 12मोहवश स्वतः ही काम्य कर्मो में प्रवृत्त हो रहे पुरुषों को पुनः शास्त्र से भी प्रवृत्त करा…
  13. Verse 13भोग में प्रवृत्त हुए पुरुष को पुत्र, पौत्र आदि विषयों में राग की उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होत…
  14. Verse 14तदनन्तर क्रमश: पुत्र आदि का मरण होनेपर उनके वियोग की परम्परा होती है, इस आशय से कहते हैं।…
  15. Verse 15तदनन्तर अपनी भी मृत्यु हो जाती है, इसलिए सर्वदा ही इसी प्रकार जन्मपरम्परा से मरण के मुख म…
  16. Verse 16इस प्रकार परिवर्तमान अज्ञानी जीवों का सर्परूप से वर्णन करते है। त्रिविध तापों से शून्य अच…
  17. Verse 17उनके द्वारा प्रत्येक जन्म मे प्राप्त किया जानेवाला यौवन भी-मोक्षहेतु विवेक, वैराग्य, श्रव…
  18. Verse 18इसी प्रकार उनकी जीभ आदि इन्द्रियाँ भी व्यर्थ और प्रयोजन शून्य हैं, ऐसा दिखलाते है । कमल क…
  19. Verse 19दुःख ओर शोकरूपी महान ग्रन्थियों से युक्त, कष्टरूपी कण्टको से आकीर्णं ददिद्रतारूपी दृढ शाल…
  20. Verse 20सत्य वस्तु का अवलम्बन न होने के कारण अन्तःशून्य (सारहीन) कोटरयुक्त, अपनी उन्नति के भार से…
  21. Verse 21आरंभकाल में पहले कानों के संनिहित कपोल प्रदेश का ग्रहण कर चारों ओर से निश्चयपूर्वक स्फुरण…
  22. Verse 22अज्ञान से ही दूसरी बार सृष्टि का विस्तार होता है, यह दिखलाते है । सारभूत वस्तु से सदा शून…
  23. Verse 23चिदाभास-प्रकाशरूपी पुष्पों से उज्जवल, व्यावहारिक सत्यतारूपी लता, जिसमें जगतरूपी पल्लव हैं…
  24. Verse 24जिसमें बड़े-बड़े पर्वत ही स्तम्भ हैं, सूर्य, चन्द्र ही झरोखे हैं, गगन ही छपरा या छत है, ऐ…
  25. Verse 25अत्यन्त विस्तीर्णं संसाररूपी सरोवर में उत्पन्न शरीररूपी पुष्करो में (कमलो में) अन्तःस्थ च…
  26. Verse 26आकाशमार्गरूपी नीलमणि से निर्मित महान कृत्रिम भूभागरूपी निरन्तर शोभायमान भुवनोदर में दिव्य…
  27. Verse 27आशारूपी सूत से बंधी हुई, अपनी वासना-शलाकारूप शरीर में जो जगत के अन्तर्गत जीवसमूहरूपी पक्ष…
  28. Verse 28निरन्तर पतनों से युक्त पृथ्वी आदि भूतरूपी पत्रपरम्परावली सृष्टिलता जो प्राण-वायु से कम्पि…
  29. Verse 29स्वात्मतादात्म्य अध्यास से जिन्होंने रक्त, मांस, मल, मूत्र आदि देहरूप उग्र नारकीय कीचड़ क…
  30. Verse 30नील मेघरूपी सेवार से युक्त, आकाशमार्ग में स्थित स्वर्गरूपी सरोवर में चन्द्रखण्ड की कणिका…
  31. Verse 31विविध काम्य कर्मो के फलरूपी भ्रमरो से मलिन, वासनाओं के जालो से वेष्टित तथा स्पन्दरूपी सुग…
  32. Verse 32संसाररूपी स्वल्प जलाशय में प्रस्फुरित हो रही सृष्टिरूपी विचारी क्षुद्र मछली को (सोरी नामक…
  33. Verse 33जलतरगों के फेनं की माला की नाई भंगुर तथा एकमात्र तत्स्वरूप भी अन्य के सदृश प्रतीयमान प्रत…
  34. Verse 34क्षणभर में विनष्ट हो जानेवाले अनेक भूतरूपी सकोरों का निर्माण कर रहा कालरूपी कुम्हार इस सं…
  35. Verse 35अचल ब्रह्मरूपी पद में उत्पन्न सम्पूर्ण व्यवहारो में समर्थ असंख्य जगतस्वरूप जंगलों के जाल…
  36. Verse 36निरन्तर उत्पत्ति ओर विनाश से, दुःख ओर सुख की सैकड़ों दशाओं से उस प्रकार जगत्स्थिति जो विप…
  37. Verse 37इस प्रकार की अनर्थ- परम्परा का परिज्ञान होने पर भी अज्ञानियो को वैराग्य क्यो नहीं होता, इ…
  38. Verse 38ज्ञान से अज्ञान का बाध होने पर भी जो वासना अधिकारप्राप्ति के अनुकूल प्रारब्ध के बल से इन्…
  39. Verse 39प्राणियों की सृष्टिरूपी धूलि की पंक्ति से युक्त नियतिरूपी आँधी कालरूपी सर्प के गले के भीत…
  40. Verse 40विनाशरूपी बडवाग्नि के मुख में चारों ओर से सुख-दुःखात्मक फेनों से युक्त समस्त पदार्थरूपी ज…
  41. Verse 41एकमात्र अधिष्ठान ब्रह्म की सत्ता से अपने स्वरूप का लाभ करनेवाली तथा अतर्कित वासना के वैचि…
  42. Verse 42प्राणीरूपी गजमुक्ताओं से शोभित, अनन्त जगतरूपी बड़े-बड़े उन्मत्त गजों का कृतान्तरूपी (कालर…
  43. Verse 43उपभोग्य ओर महान होने के कारण जिनके लिए महेन्द्र, मलय आदि कुलपर्वत ही फलस्थानीय हैं; नभो ग…
  44. Verse 44दृष्टि-सृष्टिपक्ष का अवलम्बन करके कहते हैं। चक्षु आदि इन्द्रियों की वृत्तियों के सम्बन्ध…
  45. Verses 45–46उक्त दृृष्टि-सृष्टि मेँ स्थावर और जंगम पदार्थों के अनुभवों में जो विशेष है, उसका स्थावर प…
  46. Verse 47स्थावरो में विशेष बतलाने के बाद जगमो में विशेष बतलाते है। राग-द्वेष से उत्थित सुखदुःखात्म…
  47. Verse 48जंगम जाति में भी कृमि, कीट आदि को दुःखानुभव अधिक होता है, यह उसके कारण प्रदर्शनमुख से बतल…
  48. Verse 49स यद्यदेवास॒जत० (उसने जिस जिसका सर्जन किया, उस उसको भक्षण करने के लिए पकड़ लिया) इस श्रुत…
  49. Verse 50इस प्रकार स्थावर पदार्थों में नियत समय पर फल, पुष्प आदि परिणाम का होना और अनिवार्य शीत, त…
  50. Verse 51अब तीनों लोको की तीन कमलो के रूप में कल्पना करके उसमें के प्राणियों की भ्रमर, समूह के रूप…
  51. Verse 52अब तत्‌-तत्‌ फलों में नियत प्राणियों की क्रिया को काली के रूप में, ब्रह्माण्ड को उसके भिक…
  52. Verses 53–57अब क्रियाओं के फलभूत त्रिलोकी की वृद्धकामिनी के रूप में उत्प्रेक्षा करते हैं। त्रिलोकी एक…
  53. Verse 58अव काल का महासमुद्र के रूप में वर्णन करते है । प्रत्येक कल्परूप क्षण में क्षीण हो जानेवाल…
  54. Verse 59सैकड़ों भ्रम और तृष्णारूपी अगाध जल-प्रवाह जिसमें बह रहा है, ऐसे काल-रूप महानद में बार-बार…
  55. Verse 60काल की मेघ के रूप मे कल्पना करते है। उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी…
  56. Verse 61अति उन्नत कालरूपी तालवृक्ष से ब्रह्माण्डरूपी फल की पंक्तियाँ, जिनके लिए प्राणीरूपी कोए उड…
  57. Verse 62श्रीरामजी, इसी ब्रह्मचैतन्य में निमेषमात्र मे ब्राह्मी सृष्टि पैदा करनेवाले तथा क्षणमात्र…
  58. Verse 63हजारों बार निमेष के उन्मेषमात्र काल में जिन्होंने कल्पों के समूह नष्ट- भ्रष्ट कर दिये हैं…
  59. Verse 64वे देवनायक भी जिसके निमेष से उत्पन्न होते हैं ओर विनष्ट होते हैं, ऐसा भी कोई देवाधिदेव है…
  60. Verse 65यदि शका हो कि यह सब किस तरह सम्भव हो सकता है ? तो माया में सभी का संभव होने के कारण इस वि…
  61. Verse 66अज्ञान-विभूतियों के विस्तार का उपसंहार करते है । उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पां से प्राप्त अर्…
  62. Verse 67कथित अर्थ का संक्षेप स्पष्टीकरण करते हैं। श्रीरामजी, जो कुछ सम्पत्तियाँ हे, जो कूछ निरन्त…