Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
न संभवन्ति का नाम शक्तयश्चित्रपूरकाः ।
एवमक्षीणसंकल्पलब्धार्थभरभासुरा ।
जागती कल्पना येयं तदज्ञानविजृम्भितम् ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान-विभूतियों के विस्तार का उपसंहार करते है ।
उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पां से प्राप्त अर्थसमूह से देदीप्यमान जगत की जो यह कल्पना है, वह भी
अज्ञान का विलास हे