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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

चिद्भित्तौ स्पन्दशुभ्रायां रङ्गैः पञ्चभिरिन्द्रियैः । उन्मीलयति संसारचित्राणि विधिचित्रकृत् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

दृष्टि-सृष्टिपक्ष का अवलम्बन करके कहते हैं। चक्षु आदि इन्द्रियों की वृत्तियों के सम्बन्ध से अति धवल चैतन्यदीवार में पाँच बाह्य इन्द्रियों के रंगों से विधातारूपी चित्रकार (दृष्टिमात्र से सृष्टि करनेवाला द्रष्टारूपी चित्रकार) संसाररूपी चित्र खींचा करता है