Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

कालेन किंचिदालक्ष्य स्वशरीराकुलीकृताः । शीतवातातपप्रौढाः प्रोल्लसत्पुष्पदीप्तयः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्थावर पदार्थों में नियत समय पर फल, पुष्प आदि परिणाम का होना और अनिवार्य शीत, ताप आदि का सहना विशेष है, यह बतलाते हैं। जिनके शरीर का मूलभाग पृथ्वी के छिद्र में प्रविष्ट हो गया है, ऐसे वृक्ष आदि स्थावर पदार्थ- भोगजनक किसी स्वकीय या परकीय अदृष्ट को निमित्त बनाकर मनुष्य, पक्षी आदियों के द्वारा अपने शरीर में पीडित वसन्त आदि ऋतुविशेषों मे विकसित कुसुम शोभा से सुशोभित तथा फलप्रद; शीत, वायु ओर ताप को सहने के कारण प्रौढ अतएव तप, शम, दम, तितिक्षा, औदार्य आदि उत्तम स्वभावो से सुसम्पन्न तपस्वी की नाई-काल का अतिक्रमण किया करते हैं