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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

अजस्रगत्वरीं सर्वपरिवर्तविधायिनीम् । निमेषशतभागाङ्गीमसद्दुःसाधिताङ्कुराम् ॥ ४५ ॥ सूक्ष्मां कालस्य कलनां स्वसमुत्थानकारिणीम् । ध्यानेनैवान्ववेक्ष्यैताः स्थिताः स्थावरजातयः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त दृृष्टि-सृष्टि मेँ स्थावर और जंगम पदार्थों के अनुभवों में जो विशेष है, उसका स्थावर पदार्थों में पहले दिग्दर्शन कराते हैं। ये स्थावर जातिर्यो-निरन्तर विनाशशील, समस्त पदार्थो का परिवर्तन कर देनेवाली, निमेष के शतांशभागरूपी अंग से युक्त, दुःखपूर्वक साधित असत्‌पदार्थरूप अंकुर से समन्वित तथा आत्मा का जगदाकाररूप से विर्वत करनेवाली सूक्ष्मातिसूक्ष्म काल की कलना का एकमात्र भीतरी ध्यान से ही यानी बाहर के विस्पष्ट व्यवहार में असमर्थ अनुभव से प्रत्यक्ष कर अवस्थित रहती हैं