Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
कालः कवलितानन्तजगत्पक्वफलोऽप्ययम् ।
घस्मराचारजठरः कल्पैरपि न तृप्यति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर अपनी भी मृत्यु हो जाती है, इसलिए सर्वदा ही इसी प्रकार जन्मपरम्परा से मरण के मुख
में प्रवेश होता रहता है, यों कहते हैं।
जिसने अनन्त जगतरूपी पके फलों को कवलित कर दिया है और जो सदा खाने की चेष्टा
कर रहे उदर से युक्त है, ऐसा यह काल कलपों तक जो तृप्त नहीं होता, वह भी अज्ञान का
विलास हे