Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
क्षुब्धैर्युगपरावर्तैर्वासनाश्रृंखलोम्भिता ।
महाशनिनिपातैश्च न भग्नाऽबुद्धधीरता ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार की अनर्थ- परम्परा का परिज्ञान होने पर भी अज्ञानियो को वैराग्य क्यो नहीं होता, इस
पर कहते है।
वासनारूपी जंजीरों से बँधी अज्ञानियों की दृढ मूर्खतारूपी धीरता क्षुभित युगो के आवागमन तथा
कठोर वजो के आघातं से भी विदीर्ण नहीं होती, इसलिए अज्ञानियों को वैराग्य नहीं होता