Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
तादृशोऽप्यस्ति देवेशो ह्यनन्तेयं क्रियास्थितिः ।
अनन्तसंकल्पमये शून्ये च ब्रह्मणः पदे ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि यह सब किस तरह सम्भव हो सकता है ? तो माया में सभी का संभव
होने के कारण इस विषय में असंभावना करना किसी प्रकार भी युक्ति युक्त नहीं है, इस आशय से
कहते है ।
अनन्त संकल्पप्रचुर, समस्त विकल्पों से शून्य ब्रह्मरूप पद में सैकड़ों आश्चर्यों की पूर्ति करनेवाली
ऐसी कौन-सी शक्त्यो नहीं हैं ? अर्थात् सभी शक्तियाँ उसमें विद्यमान हैं