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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

व्याधूतजर्जराकीर्णजनतापर्णराजयः । स्वकर्मपवना वान्ति नानावकररेणवः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर क्रमश: पुत्र आदि का मरण होनेपर उनके वियोग की परम्परा होती है, इस आशय से कहते हैं। व्याधि आदि से जर्जर पुत्र आदि कुटुम्बी जनसमूहरूपी पत्तों की पंक्तियाँ जिन्होंने गिरायी हैं और आँधी के कणों की नाई, विवेक दृष्टियों का अपहरण करनेवाले विक्षेपविशेष जिन में विद्यमान हैं, ऐसे दुष्कर्मपरिपाकरूपी पवन जो बहते हैं, वह भी अज्ञान का विलास ही है