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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अन्तःशून्योन्नतिध्वस्तचित्तचैत्यकृतालयः । मायाबहुलयामिन्यां लोभोलूको विवल्गति ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

सत्य वस्तु का अवलम्बन न होने के कारण अन्तःशून्य (सारहीन) कोटरयुक्त, अपनी उन्नति के भार से विदीर्ण चित्तरूपी चैत्यवृक्ष में निवास करनेवाला लोभरूपी उल्लू जो अज्ञानरूपी कृष्णपक्ष की रात्रि में विशेषरूपसे गर्जन करता हे, वह भी अज्ञान का विलास है