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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

कटूकृतान्तःकरणो नानासुखविशारदः । वर्धते हि गतस्नेहं जन्मप्रतिविषारसः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

भोग में प्रवृत्त हुए पुरुष को पुत्र, पौत्र आदि विषयों में राग की उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होती रहती है, ऐसा कहते हैं। आपाततः अनेकविध सांसारिक सुखो में निपुणः; परिणाम में दुख में पर्यवसायी; द्वेष, मात्सर्य, आदि चिन्ता का उत्पादक होने के कारण स्नेहशून्यतापूर्वक अन्तःकरण में कटुता पैदा करनेवाला और जन्मरूपी विषलता के पल्लवो, रस की नाई, वृद्धि करनेवाला राग बढ़ता रहता है