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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यन्मुक्तावलिता रत्नभूषिता भान्ति योषितः । मदेन्दावुदिते क्षुब्धकामक्षीरार्णवोर्मयः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले महाराज विष्ठजी सम्पूर्ण विवेक का अपहरण करनेवाली तथा तत्क्षण अनर्थ गर्तो में गिरानेवाली प्रस्तुत स्त्या ही अज्ञान ओर काम की महाविभूतियाँ है, इस आशय से उन्हीका पहले वर्णन करते हैं। मदरूपी चन्द्र के उदित होने पर मोतियों से वेष्टित तथा रत्नों से सुशोभित स्त्रयो क्षुब्ध कामरूपी क्षीरसमुद्र के तरगों की नाई जो दिखाई पडती हैं, वह केवल अज्ञान की ही विभूति है

सर्ग सन्दर्भ

छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्ग अनर्थ आदि में काम आदि के द्वारा होनेवाली रम्यतायुक्त अर्थरूपता अज्ञान की विभूतियाँ हैं इसका सविस्तार वर्णन ।