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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

निःसारा क्रमशः क्रान्तधराधरसमुन्नतिः । डिण्डीरपिण्डिकेवेयं सृष्टिरायाति पुष्टताम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञान से ही दूसरी बार सृष्टि का विस्तार होता है, यह दिखलाते है । सारभूत वस्तु से सदा शून्य, रचना करने के लिए उपक्रान्त, पर्वतो की नाई समुन्नत फेन की पिण्डिका के सदृश जो जगत-दृष्टि दृढता प्राप्त होती है, वह भी अज्ञान का विलास है