Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
कल्पमात्रनिमेषेणोड्डीनाः कारणसारसाः ।
उत्पत्त्योत्पत्त्य नाशिन्यः संतप्ताः सृष्टिविद्युतः ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
काल की मेघ के रूप मे कल्पना करते है।
उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हे चित्प्रकाश के आश्रय
से प्रकाशशक्ति प्राप्त हुई हैं, जो प्रस्फुटि होती हैं, वह भी अज्ञान का विलास है