Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 31
तीसवाँ सर्ग समाप्त इकतीसवाँ सर्ग जिससे मन, प्राण ओर इन्द्रियों के द्वारा बाहर और भीतर प्रकाश होता है, उस शुद्ध चिति का जीवरूपता आदि के निषेध से प्रदर्शन |
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- Verse 1ईश्वर ने कहा : जिस प्रकार स्वाप्निक मदिरा-मद से जनित मोह में गिरी हुई मुग्धा स्त्री सम्भ्…
- Verse 2जिस प्रकार विपरीत-मतियुक्त मुग्धा स्त्री मरी हुई न होने पर भी मैं मर गई, नष्ट न हुई भी मै…
- Verse 3विपरीत हुई बुद्धि कुम्हार के घूमते हुए चाक को भी जिस प्रकार बिना निमित्त के ही स्थिर देखत…
- Verse 4इस चिति के संसारानुभव में कारण चित्त ही है, लेकिन वह कारणरूप चित्त कोई पदार्थ ही नहीं है;…
- Verse 5चित्त की सत्ता सिद्ध न होने से ही उसके वेत्य (विषय) जगत की भी सत्ता सिद्ध नहीं है, यही कह…
- Verse 6चित्त के निषेध से ही विति में चक्ष आदि इन्द्रियप्रयुक्त दृश्य, दर्शन और द्रष्टारूप त्रिपु…
- Verse 7चिति में चित्तवृत्ति, चेतन (चित्तवृत्ति के आश्रय) ओर चेत्य (उक्त वृत्ति के विषय) आदि का (…
- Verse 8जैसे आकाश में पर्वतत्व नहीं हे, वैसे ही चिति में अहन्ता, त्वन्ता ओर तत्ता दूसरी परोक्षवस्…
- Verse 9जैसे परमाणु के अन्दर सुमेरु नहीं रहते, वैसे ही इसमें अनेक प्रकार के जीव तथा प्रत्येक शरीर…
- Verse 10"अथा आदेशो नेति नेति“ इत्यादि सर्वदृश्यों के शास्त्रीय निषेध भी तत्त्वसाक्षात्कारपर्यन्त…
- Verse 11इसमें शून्यता और अशून्यता इस प्रकार नहीं है, जिस प्रकार शिला के गर्भ में वृक्ष आकाश में अ…
- Verse 12तव तो सम्पूर्ण अनर्थो का मूलकारण हिरण्यगभत्मिक समष्टि-चित्त ही इस चिति का दोष है, क्योकि…
- Verse 13इसीलिए तत्त्वज्ञ पुरुष मे तथोक्त भावना के अभाव से ही सम्पूर्ण अनर्थो की शान्ति हो जाती है…
- Verse 14यही कारण है कि तृण की नाई तिरस्कार के योग्य भी यह त्रैलोक्यपदार्थ केवल भावना के यानी वासन…
- Verse 15तथोक्त भावना से स्थित हुआ यह संसाररूपी अनर्थ स्वाधीन होता हुआ भी दुःसाध्य हे । (यदि शंका…
- Verse 16केवल भावनामात्र का त्याग कर देने पर परम पुरुषार्थस्वरूप परमार्थ चिति सर्वत्र अनायास ही सु…
- Verses 17–18वह चिति सम्पूर्ण पदार्थो का अवभास करनेवाली सर्वव्यापक, नित्य, निर्मल, नित्योदित, मन से रह…
- Verse 19जिस प्रकार दीपक पदार्थो के प्रकाशन के लिए कोई दूसरी क्रिया नहीं करता, केवल अपनी स्वरूपस्थ…
- Verse 20ऐसी सामर्थ्य रखती हुई भी वह चिति केवल देहादिभाव से वास्तव में मलिन न होती हुई भी मलिन हो…
- Verse 21अब सर्वगामिनी और अत्यंत सूक्ष्म चिति का एक-एक शरीर के अन्दर नख से लेकर सिर तक जो विशेषव्य…
- Verse 22भद्र, इसी उपचय के कारण जाग्रत पुरुष की चिति बाह्यरूप आदि विषयों के अवलोकन एवं अन्दर मानसि…
- Verse 23जिस प्रकार साधु हुआ पुरुष भी दुर्जन-संगति से चिरकाल तक चित्तके संस्कृत होने पर दजन की इच्…
- Verse 24इसीलिए चित्त के पुनः ब्रह्मरूपता से भावित होने पर वह ब्रह्मरूप ही हो जाता है, इस आशय से द…
- Verse 25जिस प्रकार सुन्दर दर्पण अपने ऊपर आरोपित मल की शान्ति से प्रतिमा स्थिति (बार-बार प्रतिबिम्…
- Verse 26असत्-रूप अज्ञान के लाभ से चिति का संसार बढता जाता है ओर सच्चिदानन्दस्वरूप चितिस्वभाव के…
- Verse 27चयनस्वभाव होने के कारण जव चिति अपने भीतर असत्-रूप भिन्नता का संचय करती है, तब मानों अहन्…
- Verse 28जैसे थोड़े से स्पन्दन से यानी डण्ठल के वियोजक प्रच्युतिमात्र से पर्वत के तट प्रान्त- प्रद…
- Verse 29रूप आदि विषयों की जो यह सत्ता है, वह चिति की ही हे । चिति स्वयं निर्मल ही हे । भेद ओर अभे…
- Verse 30चित्तसाक्षी की केवलसत्ता से ही चित्त, इन्द्रिय आदि में ज्ञान ऐसे होता है, जैसे केवल आलोक-…
- Verses 31–33सामान्यरूप से कथित विषय का विशेषरूप से वश्च आदि इन्द्रियो मेँ विभागशः उपपादन कर रहे भगवान…
- Verses 34–35इस प्रकार स्पर्शन्द्रिय से होनेवाले त्रिपुटी-भानस्थल में भी त्वगिन्द्रिय ओर वायु दोनों जड…
- Verse 36इसी प्रकार कर्मन्द्रियों की प्रवृत्तियों में हेतुभूत संकल्पस्वरूप मनोवृत्ति, उसके मालिन्य…
- Verse 37किरी तरह के विकार आदि के बिना इस जगत को धारण कर रही अद्वितीया यह चिति न अस्त होती है, न उ…
- Verse 38संकल्पशून्यस्वरूप यह चिति अपने-आप, संकल्प से जीवरूपता प्राप्त कर जड़ जगत का स्वरूप चैतन्य…
- Verse 39अव चैतन्य के बाहर निर्गमन मे रथ- परम्परा की कल्पना करते हुए कहते हैं। इस चिति का रथ जीव ह…
- Verse 40मन का रथ प्राण है, प्राण का रथ इन्द्रिय समूह है, इन्द्रियसमूह का रथ देह है ओर देह का रथ क…
- Verse 41सभी रथों का कर्म संसार में परिभ्रमण ही हे । जरा एवं मरणधर्मवाले देहरूपी पिंजडे से युक्त ज…
- Verse 42मायिकत्व का ही उपपादन करते है। इस प्रकार का असदात्मक यह जगद्रूप चक्र विशाल स्वप्न की नाई…
- Verse 43“मन का रथ प्राण है” यह जो कहा गया है, उसमें वक्ष्यमाण अर्थोपयोगी कुछ वैशिष्ट्य कहने के लि…
- Verse 44जहाँ पर प्रकाशलक्ष्मी स्थित रहती है, वहीं पर रूप प्रकाशित होता हे । सूत्ररूप होने के कारण…
- Verse 45इसी प्रकार मन भी प्राण-क्रिया का निमित्त है, यो व्यतिरेक सहचर के प्रदर्शन द्वारा कहते है।…
- Verse 46इसी प्रकार प्राण के निरोध से भी मन का निरोध होता है, यह कहते हैं। प्राण-वायु के भली प्रका…
- Verse 47इसीलिए मन का रथ प्राण है, यह कहा गया है, यों कहते हैं। जहाँ पर प्राण-वायु जाता है, वहीं प…
- Verse 48जिस प्रकार क्षेपण -यन्त्र से (गोफन से) फेंका गया पाषाण तत्काल देशान्तर मेँ चला जाता हे, उ…
- Verse 49जहाँ पुष्प रहता है, वहाँ गन्ध रहती है; जहाँ आग रहती हे, वहाँ उष्णता रहती हे; जहाँ समष्टि-…
- Verse 50इसीलिए चाक्षुष आदि संवित्तियों में प्रत्येक संवित्ति के प्रतिवायु भी निमित्त है, यह मैंने…
- Verse 51आकाश की नाई अत्यन्त स्वच्छ संवित् सभी जड़ और अजड स्थलों में रहती है, परन्तु लिंग शरीर मे…
- Verse 52सामान्यसत्तामात्रस्वरूप से सब जड़ पदार्थो में भली प्रकार स्थित हुई भी वह चिति एकमात्र जड़…
- Verse 53जो देह जीवनदशा में अनेक विस्तृत चमकीले उल्लासो से व्यवहार करती है, वही प्राण-वायु के चले…
- Verse 54है मुने यह परम चैतन्य अपने (&) पुर्यष्टक में प्रतिबिम्बित होता हे । ठीक ही है, स्वच्छ दर्…
- Verse 55यदि शंका हो कि मन में प्राण के कारण चित् का प्रतिबिम्ब होता है, यह पहले कहा गया और अब (&…
- Verse 56अब जीव, उसकी उपाधि तथा उसके भोग्यरूप विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय चिदेकरस सन्मात्र ब्र…