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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

स्वायत्त एव चैषोऽर्थो दुःसाध्यो भावनास्थितः । यद्यन्न साध्यते पुंसा तत्कथं क्वेव लभ्यते ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

तथोक्त भावना से स्थित हुआ यह संसाररूपी अनर्थ स्वाधीन होता हुआ भी दुःसाध्य हे । (यदि शंका हो कि अतियुलभ भावनात्याग स्वयं ही सिद्ध क्यो नहीं होता ? तो इस पर कहते हैं।) जो- जो कार्य हैं उनकी पुरुष अपने प्रयत्न से यदि सिद्धि नहीं करता, तो वे कहाँ कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? साधारण तृण भी बिना हाथ फेलाये प्राप्त नहीं किया जा सकता