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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

तत्सर्वभावनामात्रेणानर्थः प्रकृतः स्थितः । तज्ज्ञेऽप्यभावनामात्रेणानर्थ उपशाम्यति ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए तत्त्वज्ञ पुरुष मे तथोक्त भावना के अभाव से ही सम्पूर्ण अनर्थो की शान्ति हो जाती है, इसे कहते है । तत्त्वज्ञ पुरुष में तथोक्त "अहम्‌", “मम” तथा “ये सांसारिक पदार्थ सत्य है" इस प्रकार की भावना के अभाव से ही यह सम्पूर्ण अनर्थ अपने-आप संशान्त हो जाता है ओर तत्त्वज्ञ पुरुष में भी तथोक्त सारी भावनाओं के अभाव के बिना सम्पूर्णं दुःख प्राप्त होते रहते हैं