Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चित्तं हि कारणं त्वस्याः संसारानुभवे चितेः ।
न च तत्कारणं किंचिच्चित्त्वान्यत्वात्यसंभवात् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिति के संसारानुभव में कारण चित्त ही है, लेकिन वह कारणरूप चित्त कोई पदार्थ ही
नहीं है; क्योकि वह चित् या उससे भिन्न अचित् दोनों में से कोई हो ही नहीं सकता । यदि अचित्-
रूप मानेंगे, तो वह जगत के अन्तर्गत हो जाने से जगत्कल्पक ही नहीं हो सकता