Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासत एवात्मन्यसत्स्वप्न इवाततः ।
मनागपि न सत्यात्म मृगतृष्णाम्बुवत्स्थितम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
मायिकत्व का ही उपपादन करते है।
इस प्रकार का असदात्मक यह जगद्रूप चक्र विशाल स्वप्न की नाई आत्मा में ही प्रतिभासित होता
हे, मृगतृष्णिका-जल के सदृश आभासरूप से स्थित यह तनिक भी सत्य नहीं हो सकता