Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
क्षुभ्यन्तीव तु सा प्राणस्पन्दादित्यनुभूयते ।
सत्तामात्रस्वरूपेण जडेषु समवस्थिता ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
सामान्यसत्तामात्रस्वरूप से सब जड़ पदार्थो में भली प्रकार स्थित हुई भी वह चिति एकमात्र
जड़ देह में ही प्राण-वायु द्वारा उद्बोधित होकर आध्यासिक चित्तादात्म्य की सामर्थ्य से सृष्टि आदि
को ज्ञानरूप से जानती है