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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

यस्मादुदेति कलनाकुलदृश्यजालं यत्तत्र च स्थितवदित्यनुभूतमुच्चैः । यस्मान्मनो विपरिवर्तति देहदृष्ट्या सर्वं तु तत्परमवस्त्विति विद्धि विश्वम् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

अब जीव, उसकी उपाधि तथा उसके भोग्यरूप विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय चिदेकरस सन्मात्र ब्रह्म के ही अधीन हैं, इसलिये परमार्थरूप से वे ब्रह्मस्वरूप ही हैं, यों अनुभव कराते हुए शंकरजी उपर्युक्त विषय का उपसंहार करते हैं। महर्षे, चूँकि अनेक प्रकार की कल्पनाओं से ग्रस्त यह दृश्यसमूह चिति में ही उदित होता है, चूँकि उसी में स्थित और लीन हो जाता है एवं चूँकि मन ही देह दृष्टि से भ्रमग्रस्त होता है, यों ज्ञानियों द्वारा अनुभूत है, इसलिए यह सम्पूर्ण विश्व परब्रह्मस्वरूप ही है, दूसरा नहीं, यह जानिए