Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
मनः पुर्यष्टकं विद्धि सर्वकार्यैककारणम् ।
तदैव भेदैः कथितमन्यैः स्वाशयकल्पितैः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि मन में प्राण के कारण चित् का प्रतिबिम्ब होता है, यह पहले कहा गया और अब
(&) भूतान्तःकरणप्राणज्ञानकर्मेन्द्रियैर्युतम् । अविद्याकामकर्माढयं लिगं पुर्यष्टकं विदुः ॥
पाँच भूत, अन्तःकरण, प्राण, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों से युक्त तथा अविद्या, काम एवं कर्मो से
भरा लिंग शरीर पुर्यष्टक कहा गया है ।
पुर्यष्टक में चैतन्य का प्रतिबिम्ब होता है, यह कहते हैं, ऐसी स्थिति में पूर्वापर विरोध क्यों नहीं होता ?
तो इस पर कहते हैं।
महर्षे, समस्त कार्यो का एकमात्र कारण मन ही पुर्यष्टक है, यह जान लीजिए उसीको अन्य आचार्यो
ने अपने अभिप्राय से कल्पित शिष्य बोधोपयोगी उपायों से पुर्यष्टक कहा है