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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

आलोकश्रीः स्थिता यत्र रूपं तत्रैव राजते । प्राणो बली स्थितो यत्र तदेव परिवेपति ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पर प्रकाशलक्ष्मी स्थित रहती है, वहीं पर रूप प्रकाशित होता हे । सूत्ररूप होने के कारण सबका धारण ओर संचालन करने में समर्थ बलवान प्राण-वायु जहाँ स्थित रहता है, वहीं स्पन्दित होता है । ठीक ही है, जिस वन की ओर आँधी जाती है, वही वन कम्पित होता हे