Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
रूपालोकमनस्कारवलिता चिदबोधतः ।
बोधतश्चैव भवति निद्रां सदसती यतः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, इसी उपचय के कारण जाग्रत पुरुष की चिति
बाह्यरूप आदि विषयों के अवलोकन एवं अन्दर मानसिक व्यापारो से वेष्टित होती हुई बोधपक्षपातिनी
हो जाती है और निद्रा ले रहे पुरुष की चिति तो स्वप्न में वासनामय रूप आदि के अवलोकन एवं
मनोव्यापारों से वेष्टित होती हुई दो पक्षों का यानी भीतर बोध और बाहर अबोध इन दो पक्षों का
अवलम्बन करती है । इसी प्रकार सुषुप्ति में अज्ञानमात्र की साक्षिणी एवं “मेने कुछ भी नहीं जाना" इस
प्रकार उठे हुए पुरुष के स्मरण से सदसदात्मक होती हुई भी चिति असत्प्राय होकर अबोधपक्ष का ही
अवलम्बन करती है