Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
संवित्तिस्फारता चित्तं मनस्तत्प्राणकोटरे ।
सर्वत्र विद्यते संविद्व्योमस्वच्छा जडाजडे ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश की नाई अत्यन्त स्वच्छ संवित् सभी जड़ और अजड स्थलों में रहती है, परन्तु लिंग शरीर में
प्राणों के स्पन्दन से स्पष्ट अभिव्यक्ति द्वारा वह एक तरह से संचलन कर रही-सी अनुभूत होती
है