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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

साक्षिवत्तिष्ठति सती स्पन्दते न च कुत्रचित् । दीपः प्रकाशनायेव करोति न पुनः क्रियाम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार दीपक पदार्थो के प्रकाशन के लिए कोई दूसरी क्रिया नहीं करता, केवल अपनी स्वरूपस्थिति से ही प्रकाशन में समर्थ हो जाता है, उसी प्रकार यह चिति भी साक्षी की नाई केवल चुपचाप अपने स्वरूप में बैठी रहती है, चलने-फिरने ओर हिलने-डोलने में समर्थ रहती हुई भी कहीं पर हिलने- डोलने या चलने-फिरने का नाम तक नहीं लेती