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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

एवं हि कारणाभावाच्चेत्यस्यासंभवादिति । नासौ चित्तं ततश्चेत्यं यत्नतश्चेत्यते यया ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त की सत्ता सिद्ध न होने से ही उसके वेत्य (विषय) जगत की भी सत्ता सिद्ध नहीं है, यही कहते है । इस प्रकार चित्तरूप कारण का अभाव सिद्ध होने से चेत्य का (जगद्रूप विषय का) भी अभाव सिद्ध ही है । इसलिए जिस चिति के द्वारा श्रमपूर्वक चित्त अनुभूत होता है, वह चिति चित्त ओर उसके अधीन चेत्य स्वरूप नहीं है, किन्तु शुद्धरूप ही हे