Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
मलिनाप्यमुनैषा साऽविकल्पाढ्या विकल्पिनी ।
जडेवाप्यजडाभासा न सर्वा सर्वगैव च ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी सामर्थ्य रखती हुई भी वह चिति केवल
देहादिभाव से वास्तव में मलिन न होती हुई भी मलिन हो गई है यानी नानाविध रागद्रेषादि दोषों से
संयुक्त हो गई है । इसमें यद्यपि किसी प्रकार का विकल्प है नहीं, फिर भी विविध विकल्पों से युक्त हो
गई हे । अजड होती हुई भी जड-सी भासती है एवं सर्वगामिनी होती हुई भी असर्वगामिनी