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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

केवल केवलीभावस्वच्छतैवावशिष्यते । न चित्तात्कस्यचिद्दोषाज्जातयैतदवाप्यते ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

तव तो सम्पूर्ण अनर्थो का मूलकारण हिरण्यगभत्मिक समष्टि-चित्त ही इस चिति का दोष है, क्योकि एकमात्र उसी कारण से चतुर्विध शरीरो में उत्पन्न हुई यह विति इन सब सांसारिक दुःखो को प्राप्त करती है । उनका हम लोग कभी उच्छेद नहीं कर सकते 2 इस शका पर कहते है। चिति के दोषभूत हिरण्यगर्भ के चित्तरूप निमित्त से उत्पन्न हुई यह चिति इन दुःखों को प्राप्त करती है, ऐसी बात नहीं है, किन्तु हिरण्यगर्भ द्वारा उत्पन्न किये गये जो देह, इन्द्रिय ओर उनके विषय हैं, उन सबमें "अहम्‌, "मम" तथा “ये सब अर्थ सत्य हैं” इत्यादि केवल भावनामात्र से ही यह संसाररूप अनर्थ उपस्थित हुआ है