Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
निर्विकल्पा परा सूक्ष्मा चिच्चिनोति स्वसंविदम् ।
वातावाताङ्गमर्मादि यथा यन्त्रादिवेष्टने ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अब सर्वगामिनी और अत्यंत सूक्ष्म चिति का एक-एक शरीर के अन्दर नख से लेकर सिर तक जो
विशेषव्याप्तिलक्षण संचय है, उसमें युक्ति बतलाते है ।
विशेष प्रकार का अभिमान आदि कोई विकल्प न छूनेवाली, सर्वगामिनी एवं अत्यन्त सूक्ष्मस्वरूप
परा चिति प्राणप्रधान लिंग शरीर मे प्रतिबिम्बभाव से अनुगत होती हुई हाथ, पैर आदि जो अंग हैं एवं जो
हृदय आदि स्थान तथा बहत्तर हजार नाडियों के (शिराओं के) भेद हैं, उन सबको व्याप्तकर यानी
उनमें प्रवेश कर सर्वत्र पहुँची हुई अपनी संवित् का अपने उतने ही शरीर में मानों जबरदस्ती खींचकर
उस प्रकार उपचय करती है, जिस प्रकार लम्बा और सूक्ष्म रेशम आदि तन्तु टेकुआ आदि के ऊपर
वेष्टन करने पर अत्यन्त लम्बा होने पर भी अपने को उतने ही स्थान में उपसंहत कर बेर आदि के
आकार के सदुश उपचय प्राप्त करता है