Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
नेति नेति न चैवार्कमण्डले रजनी यथा ।
न वस्तुतावस्तुते च तुषारे तु यथोष्णता ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
"अथा आदेशो नेति नेति“ इत्यादि सर्वदृश्यों के शास्त्रीय निषेध भी तत्त्वसाक्षात्कारपर्यन्त ही हैं,
क्योकि चित्तत्त्व का साक्षात्कार होने पर तो प्रतियोगी की प्रसिद्धि न होने से उनका कभी संभव नहीं है,
यही कहते है ।
इस चिति में “नेति नेति" इत्यादि निषेधपरक श्रुतिर्यो ऐसे नहीं हैं, जैसे सूर्य-मण्डल में रात्रि। जिस
प्रकार तुषार में उष्णता नहीं रहती, उसी प्रकार इसमें वस्तु से अतिरिक्त वस्तुत्व ओर अवस्तुत्वरूप
धर्म भी नहीं रहते