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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

मलेन स्वर्णमायाति ताम्रतां मलमार्जनात् । पुनः कनकतामेति यथा चित्परमा तथा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए चित्त के पुनः ब्रह्मरूपता से भावित होने पर वह ब्रह्मरूप ही हो जाता है, इस आशय से दृष्टान्त कहते हैं। जिस प्रकार मालिन्य से सुवर्ण ताम्ररूप हो जाता है और मल का शोधन करने से फिर सुवर्णरूप हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानरूप मल का शोधन करने से परमचिति अपने विशुद्ध स्वरूप में हो जाती है