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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 56

पवपनर्वोँ सर्ग समाप्त छण्पनवा सर्ग॑ मायारूपी अन्धकार से शून्य वासनारहित प्रबुद्ध पुरुष व्यवहाररत होने पर भी समाधिस्थ है, यह वर्णन |

48 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त विचार, वैराग्य ओर समाधि के अभ्यास के…
  2. Verse 2शास्त्र के श्रवण से, पदार्थ तत्त्व के परीक्षण से, गुरुवचनं पर विश्वास से तथा अपने चित्त क…
  3. Verse 3वैराग्य के अभ्यास, शास्त्रर्थविचार, प्रज्ञा, गुरु-उपदेश और यमनियमों के क्रम से पुण्य पद प…
  4. Verse 4सम्यक्‌ प्रबोधयुक्त तीक्ष्ण ओर दोषरहित मति अन्यान्य सब सामग्रियों से विहीन होती हुई भी जी…
  5. Verses 5–6श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवान्‌, हे भूत ओर भविष्यत्‌ के ज्ञाता, कोई प्रबुद्ध पुरुष व्…
  6. Verses 7–9श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस मायिक विश्व को अनात्मरूप (मिथ्या) देख रहे…
  7. Verses 10–12दोनों ही सब सन्देहो का उच्छेद करनेवाले परमपद में प्रतिष्ठित हैं
  8. Verse 13व्यवहार निरत ओर अरण्यवासी दोनों ही समान कैसे हो सकते है ? व्यवहारी पुरुष को कर्तृत्वप्रयु…
  9. Verse 14जैसे स्वप्न में निश्चल देहावयववाले सुषुप्त पुरुष का मन भी गर्तपात और उसमें निवास का कर्ता…
  10. Verse 15चित्त का जो अकर्तृत्व है वह उत्तम समाधि है, उसी को आप केवलीभाव जानिये और वही श्रेष्ठ परम…
  11. Verse 16चित्त चंचलता और अचंचलता से समाधि में और असमाधि में परम कारण कहा गया है, इसलिए उसी को आप अ…
  12. Verse 17वासनारहित मन स्थिर कहा गया है, वही ध्यान है, वही केवलीभाव है और वही सदा शान्तता है
  13. Verse 18स्वल्पवासनावाला यानी चतुर्थी आदि भूमिकाओं में क्षीणवासनावाला मन अकर्ता है। उससे सप्तम भूम…
  14. Verse 19प्रचुर वासनावाला यह मन कर्तृत्व-भाजन (कर्ता) है। कर्ता होने के कारण ही सब दुःख देता है, इ…
  15. Verse 20जिससे आत्मा देह दृश्य में अहंताममताअभिनिवेश से रहित होता है, शोक, भय और एषणाओं से शून्य ह…
  16. Verses 21–22सब पदार्थों में अहंताममताअध्यास का मन से त्यागकर अपनी अभिरुचि के अनुसार आप चाहे पर्वत पर…
  17. Verse 23भलीभाँति समाहित चित्तवाले अहंकार आदि दोषों से रहित गृहस्थं के लिए घर ही निर्जन (एकान्त) व…
  18. Verse 24हे राजपुत्र, जिसका चित्तरूपी महामेघ शान्त हो चुका यानी जो शरत्‌ के आकाश के तुल्य निर्मल ह…
  19. Verse 25हे शत्रुतापन, राग आदि वृत्तिवाले चित्त से मत्त हुए पुरुष के लिए निर्जन वन भी प्रचुर लोगों…
  20. Verse 26यह राग आदि से विक्षिप्त हुआ चित्त विविध विषयभ्रम का अन्दर लय होने से फिर सैकड़ों व्युत्था…
  21. Verse 27यदि कोई कहे कि पहले व्यवहार निरत और तत्त्वज्ञानी इन दोनों की समाधि तुल्य कैसे कही ? तो इस…
  22. Verse 28जिस विस्तृत स्वरूप के अन्दर राग-द्वेष क्षीण हो चुके हों और जिसके लिएसब भाव समान हैं वह सम…
  23. Verse 29हे जनेश्वर, उसका मन जैसे स्वप्न में वैसे ही जाग्रत्‌ में भी इस दृश्य को सत्रूप से सद्‌ ही…
  24. Verse 30प्रशान्त चित्तवाले के लिए नगर भी शून्य (निर्जन वन) है, ऐसा जो पहले कहा था, उसकी उपपत्ति क…
  25. Verse 31जिसका मन सदा अन्तर्मुख है यानी बहिर्मुख नहीं है वह पुरुष चाहे सोया हो, चाहे जागा हो, चाहे…
  26. Verse 32नित्य अन्तर्मुख स्थितिवाले पुरुष के लिए पृथिवी आदि महाभूतो से व्याप्त यह सारा जगत्‌ बाधित…
  27. Verses 33–34अन्तःशीतलता (ज्ञान प्रतिष्ठा की फलभूत पूर्णकामता) प्राप्त होने पर तो ज्वररहित पुरुषों के…
  28. Verse 35द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशाएँ अन्तःकरण तत्त्व के बाहरी भागों के तु…
  29. Verse 36वट के फल के अन्दर वट बीजों के समान जो सदा अपने अन्दर रहता है, वही दैदीप्यमान होकर विकास ह…
  30. Verse 37आरोप दृष्टि से कहकर अपवाद दृष्टि से कहते हैं। कोई वस्तु न तो बाहर है और न कहीं पर भीतर है…
  31. Verse 38आत्मतत्त्वरूप जो आन्तर वस्तु है वही बाह्यरूप होकर जगद्रूप से प्रतीत होती है । जैसे डिब्बे…
  32. Verse 39आत्मा ही जगद्रूप से ओर अहन्ता से बाह्यत्वेन ओर आन्तरत्वेन खूब स्फुरित होता है । वस्तुतः व…
  33. Verse 40अतएव यह आत्मा अपने चित्त को ही पूर्वपूर्वं अनुभव के अनुसार बहिर्मुख चक्षु आदि द्वारा बाह्…
  34. Verse 41न कोई वस्तु बाह्य है ओर न कोई आन्तर है, ऐसा जो पहले कहा उसका युक्ति से अनुभव कराते हैं ।…
  35. Verses 42–43बड़े भारी नाश के भय का ही उपपादन करते हैं। तत्‌-तत्‌ मानसी व्यथाओं से हतात्मा पुरुष के द्…
  36. Verses 44–46सन्मात्र आत्मा का साक्षात्कार होने पर तो कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यवहार करने पर भी अभिमान…
  37. Verse 47क्यो उपहास करता है, ऐसा यदि कोई कहे तो अहन्ता-ममता आदि दृष्टियों के विषय अभिमान और अभिमन्…
  38. Verses 48–49उसके लक्षणों को कहते है । जो आकाश के समान स्वच्छ हे, बाह्यचेष्टाओं का भली-भाँति (शास्त्र…
  39. Verse 50तत्त्वज्ञानी ही समदर्शी होता है, इसमें युक्ति कहते हैं। मूढ पुरुष महान्‌ (हिरण्यगर्भ के ऐ…
  40. Verses 51–56जिसके आशय में समदर्शिता बद्धमूल हो गई वह सब जगत्‌ ओर सव अवस्थाओं में हर्ष, विषाद आदि से ल…
  41. Verse 57अज्ञ जनों में किसको कलंक होता है यानी कौन कलंकी है, ऐसा प्रश्न होने पर उसका निर्देश करते…
  42. Verse 58किस उपाय से कलंक की शान्ति होती है, ऐसा प्रश्न होने पर उसे कहते हैं। वस्तु स्थितिका भली-भ…
  43. Verse 59तब संसार दु:ख प्राप्ति का क्या कारण है ? ऐसी शंका होने पर संसार दुःख प्राप्ति का उपाय कहत…
  44. Verse 60वैसे ही अहन्ता की शान्ति होने पर चित्त में सर्वदुःख वैषम्यशून्यतारूप समता प्राप्त होती हे
  45. Verse 61पाप के फल की तरह पुण्य का फल भी ज्ञानी को नहीं होता, यों उसके सब कर्मो की क्षति हो जाती ह…
  46. Verse 62ज्ञानी का न तो कर्म से कोई प्रयोजन है और न कर्मत्याग से ही उसका कोई प्रयोजन है। अपने यथार…
  47. Verse 63फल की इच्छा से उसके उपायभूत कर्म में पुरुष की प्रवृत्ति होती है, किन्तु ज्ञानी पूर्णकाम ह…
  48. Verse 64ज्ञानी की सर्वात्मता को और सबकी तदात्मता को (ज्ञानिरूपता को) दृढ़ करते हुए दोनों की निष्प…