Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यथा विपणिकालोका विहरन्तोऽप्यसत्समाः ।
असंबन्धात्तथा ज्ञस्य ग्रामोपि विपिनोपमः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रशान्त चित्तवाले के लिए नगर भी शून्य (निर्जन वन) है, ऐसा जो पहले कहा था, उसकी उपपत्ति
कहते हैं।
जैसे बाजार में इकट्ठे हुए बहुत से लोग अपने-अपने व्यवहार करते हुए भी उदासीन (जो न शत्रु हैं
और न मित्र हैं) के लिए कुछ भी उपकारक न होने से सब प्रकार से असत् ही हैं, क्योंकि उनके साथ
उसका कोई सम्बन्ध नहीं है वैसे ही ग्राम भी ज्ञानी के लिए, ग्रामवासी जनों के साथ सम्बन्ध न होने से,
अरण्य तुल्य ही है यानी विक्षेप हेतु नहीं है