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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

यस्यान्तरस्थिताहन्त्वं न विभागादि नो मनः । न चेतनाचेतनत्वे सोऽस्ति नास्तीतरो जनः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यो उपहास करता है, ऐसा यदि कोई कहे तो अहन्ता-ममता आदि दृष्टियों के विषय अभिमान और अभिमन्तव्यरूप अहन्ता ओर जगत्‌ आश्रय के सिद्ध न होने से मिथ्या हैं, इसलिए उपहास करता है, ऐसा कहते हैं। उन्हें (अहन्ता और जगत्‌ को) सर्वानुभवसिद्ध प्रत्यक्स्वभाव मेरे आश्रित मानेंगे अथवा श्रुति सिद्ध ब्रह्मभाव के आश्रित मानेंगे | मुझमें तो उनका संभव नहीं है, क्योकि द्रष्टा दृश्य का आश्रय नहीं हो सकता। परब्रह्म में भी उनका संभव नहीं है, क्योंकि असंग अद्वितीय, कूटस्थस्वरूप समब्रह्म अहन्ता ओर जगत्‌ के जन्म आदि विभ्रमता का आधार नहीं हो सकता है। जैसे शरद ऋतु की धूप से मिश्रित दूर से दिखाई दे रही लहरियां मे द्रवीभूत रजत के समान स्फुरित हो रही पुंजीभूतकान्ति लहरियों के अन्दर नहीं है, क्योकि समीप में जाने पर ओर लहरिया में डूबकर खोजने पर वह दिखाई नहीं देती और न उनके अन्दर और बाहर स्थित आकाश में है, क्योंकि आकाश में प्राप्प आदि चार प्रकारों की क्रियाओं के फल का दर्शन नहीं होता अतएव लहरों की क्रिया से उत्पन्न फल का वह आश्रय हो यह संभव नहीं है। अतः उस कान्ति के समान अहन्ता ओर जगत्‌ निराश्रय होने के कारण मिथ्या ही हैं ॥४ ६॥ अहन्ता ओर जगत्‌ के भेद का निराकरण कर उनके द्रष्टा के भेद का निराकरण करते हैं । जिस ज्ञानी का आभ्यन्तरप्रत्यगात्मरूप अहन्तारहित हो गया, जिस ज्ञानी के दृश्य जगत्‌ विभाग आदि नहीं हैं, मन नहीं है ओर मन के अधीन कल्पनावाले चेतनत्व ओर अचेतनत्व नहीं हैं, वह एक स्वात्मा हे उससे अतिरिक्त जन (चेतन) नहीं हे, क्योकि भगवती श्रुति भी कहती हे : (नाऽन्योऽतोऽस्ति द्रष्टा“ यानी उससे अतिरिक्त द्रष्टा नहीं हे