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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

अन्तःशीतलतायां तु लब्धायां शीतलं जगत् । विज्वराणामिव नृणां भवत्याजीवितस्थितेः ॥ ३३ ॥ अन्तस्तृष्णोपतप्तानां दावदाहमयं जगत् । भवत्यखिलजन्तूनां यदन्तस्तद्वहिः स्थितम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्तःशीतलता (ज्ञान प्रतिष्ठा की फलभूत पूर्णकामता) प्राप्त होने पर तो ज्वररहित पुरुषों के तुल्य सारा का सारा जगत्‌ जीवनपर्यन्त शीतल हो जाता है । भीतर तृष्णा से सन्तप्त लोगों का जगत्‌ वनाग्नि सन्तापमय होता हे, क्योकि भीतर सभी जीवों का चित्त जैसे तप्त या शीतल होता है वही बाहर जगत्‌ के रूप से स्थित होता है