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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

सबाह्याभ्यन्तरं शान्तमात्मनो भेदितं जगत् । अहन्त्वादिस्थिते भेदे भूरिभङ्गभयं तु तत् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

न कोई वस्तु बाह्य है ओर न कोई आन्तर है, ऐसा जो पहले कहा उसका युक्ति से अनुभव कराते हैं । बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकार का जगत्‌ दोनों अनुस्यूत सत्‌ आत्मा से पृथक्‌ होकर असत्‌ ही है अतःशान्त ही है यानी मृत ही है, किन्तु पृथक्ृकरण के अभाव में उसकी सत्ता से ही बाह्य और आभ्यन्तर भेद के रहने पर उसमें अहंताममता का अध्यास होने से उसका नाश होने पर बड़े भारी नाश का भय होता है