Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 51–56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verses 51–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 51-56
संस्कृत श्लोक
ईदृशाशयसंपन्नो महासत्त्वपदं गतः ।
तिष्ठतूदेतु वा यातु मृतिमेतु न तत्स्थितिम् ॥ ५१ ॥
वसतूत्तमभोगाढ्ये स्वगृहे वा जनाकुले ।
सर्वभोगोज्झिताभोगे सुमहत्यथवा वने ॥ ५२ ॥
उद्दाममन्मथं पानतत्परो वापि नृत्यतु ।
सर्वसङ्गपरित्यागी सममायातु वा गिरौ ॥ ५३ ॥
चन्दनागुरुकर्पूरैर्वपुर्वा परिलिम्पतु ।
ज्वालाजटिलविस्तारे निपतत्वथवाऽनले ॥ ५४ ॥
पापं करोतु सुमहद्बहुलं पुण्यमेव च ।
अद्य वा मृतिमायातु कल्पान्तनिचयेन वा ॥ ५५ ॥
नासौ किंचिन्न तत्किंचित्कृतं तेन महात्मना ।
नासौ कलङ्कमाप्नोति हेम पङ्कगतं यथा ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके आशय में समदर्शिता बद्धमूल हो गई वह सब जगत् ओर सव अवस्थाओं में हर्ष, विषाद
आदि से लिप्त नहीं होता है, ऐसा कहते है।
इस प्रकार आशयवाला ब्रह्मपद को प्राप्त हुआ पुरुष चाहे निष्किंचन रहे चाहे ऐश्वर्य आदि अभ्युदय
को प्राप्त हो, चाहे पुत्र, बन्धु-बान्धवआदि की मृत्यु को प्राप्त हो, चाहे पूर्वोक्त अभ्युदय स्थिति को
प्राप्त न हो । चाहे उत्तमोत्तम भोग्य पदार्थों से परिपूर्ण और बन्धु-बान्धवों से भरपूर घर में रहे, चाहे सब
प्रकार के भोगों से शून्य विशाल अरण्य में रहे । चाहे मदिरापान में निरत होकर प्रबल कामवेदना के
साथ नाचे, चाहे सब आसक्ति का त्याग कर निर्विकार हो पर्वत पर तपस्या के लिए जाय, चाहे चन्दन,
अगर ओर कपूर से शरीर का लेप करे, चाहे धधकती हुई ज्वालाओं से प्रचुर विस्तारवाली अग्नि में गिरे,
चाहे महापाप करे, चाहे प्रचुर पुण्य करे, चाहे आज ही मृत्यु को प्राप्त हो, चाहे अनेक प्रलयो के बाद मरे,
यह (समदर्शी) महात्मा कुछ (अहन्ता का आश्रय मरण, दुःख आदि विकारों से युक्त देह, मन आदि)
नहीं होता हे, अतएव उस महात्मा ने वह कुछ भी नहीं किया । जैसे कीचड़ में गिरा हुआ सुवर्णं कलंकित
नहीं होता वैसे ही वह कलंक को प्राप्त नहीं होता हे