Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 48–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
व्योमस्वच्छो बहिष्ठेहां सम्यगाचरतीह यः ।
हर्षामर्षविकारेषु काष्ठलोष्टसमः शमः ॥ ४८ ॥
आत्मवत्सर्वभूतानि परद्रव्याणि लोष्टवत् ।
स्वभावादेव न भयाद्यः पश्यति स पश्यति ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके लक्षणों को कहते है ।
जो आकाश के समान स्वच्छ हे, बाह्यचेष्टाओं का भली-भाँति (शास्त्र ओर शिष्टाचार के अविरोध
से) आचरण करता हे ओर हर्ष, क्रोध आदि विकारों मे काठ ओर ठेले के समान शान्त स्वभाववाला हे,
सब जीवों को अपने समान और परद्रव्य को ढेले के समान स्वभाव से ही न कि भय से देखता है वही
सम्यक् दर्शनवान् है