Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अर्थोऽतनुस्तनुर्वापि नासद्रूपेण चेत्यते ।
सद्रूपो नानुभूतोऽज्ञे न ज्ञेनैव न तत्तया ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी ही समदर्शी होता है, इसमें युक्ति कहते हैं।
मूढ पुरुष महान् (हिरण्यगर्भ के ऐश्वर्यपर्यन्त) अथवा अल्प (कौड़ी भर) स्वर्ण, कामिनी आदि
विषय को मिथ्या नहीं देखता और उसके अधिष्ठान सद्रूप का उसने अनुभव नहीं किया, इसलिए
सन्मात्रस्वभाव से भी उसे नहीं देखता, किन्तु तत्त्वज्ञानी ही उसे पूर्वोक्त रीति से देखता है, इसलिए
दोनों प्रकार से उसमें समदर्शिता की उपपत्ति होती है, यह भाव हे