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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

आत्मैव स्फुरति स्फारं जगत्त्वेनाप्यहंतया । बाह्यत्वेनान्तरत्वेन स च नासन्न सन्विभुः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा ही जगद्रूप से ओर अहन्ता से बाह्यत्वेन ओर आन्तरत्वेन खूब स्फुरित होता है । वस्तुतः वह न तो चक्षु आदि से अदृश्य अहंकाररूप है ओर न उससे दृश्य बाह्य स्थूल रूप है, किन्तु विभु यानी दोनों में अनुस्यूत सन्मात्ररूप है