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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

सर्वभावपदातीतं सर्वभावात्मकं च वा । यः पश्यति सदात्मानं स समाहित उच्यते ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि पहले व्यवहार निरत और तत्त्वज्ञानी इन दोनों की समाधि तुल्य कैसे कही ? तो इस पर कहते हैं। जो सर्वभावपदातीत अथवा सर्वभावात्मक आत्मा को सदा देखता है वह समाहित कहा जाता है। तत्त्वज्ञानी समाधि में सर्वभावपदातीत तत्त्व को देखता है और व्यवहार में सर्वभावात्मक तत्त्व को देखता है यों केवल एक पिण्ड में अहंकार न होने से उसमें राग आदि की प्रसक्ति नहीं होती है, यह भाव है