Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
इच्छास्ततः समुद्यन्ति न मञ्जर्य इवोपलात् ।
याश्चोद्यन्ति च ताः सर्वाः स एवाप्स्विव वीचयः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
फल की इच्छा से उसके उपायभूत कर्म में पुरुष की प्रवृत्ति होती है, किन्तु ज्ञानी पूर्णकाम है,
अतएव उसको उक्त फलेच्छा ही उदित नहीं होती, ऐसा कहते हैं।
जैसे पत्थर से मंजरियाँ उत्पन्न नहीं होती वैसे ही ज्ञानी पुरुष से इच्छाएँ उत्पन्न नहीं होतीं ।
कदाचित् इच्छाएँ उत्पन्न होती भी हैं, वे जल में तरगों के समान तद्रूप (उससे अभिन्न) ही हैं यानी कभी
वासनाभ्यास वश उदित हुई इच्छाएँ भी परमार्थदृष्टि से उसकी स्वात्मभूत ही हैं