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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 23

बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग ज्ञानी का शरीररूपी नगर में राज्यवर्णन, आसक्तिरहित सद्भोगों से विनोद ओर मनोजयरूपी सुख के उदय का वर्णन ।

56 verse-groups

  1. Verses 1–2जीवन्मुक्त के शरीररूपी नगरी राज्य का वर्णन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी के तदुपय…
  2. Verse 3श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, यह शरीर नगरी कैसे है ओर इसमें रहनेवाला योगी एकमात्र स…
  3. Verse 4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानी की देहनगरी बड़ी मनोहर हे । सब गुणों से य…
  4. Verses 5–7इसमें नेत्ररूपी झरोखों में स्थित इन्द्रियरूपी दो दीपों से अन्यान्य भुवन प्रकाशमान हैं, भु…
  5. Verse 8इसमें बड़ी-बड़ी जंघाओं और शरीर के मध्यभाग की सन्धि के अग्रभाग में उपस्थेन्द्रिय ही नगर मध…
  6. Verse 9नील पत्तों के तुल्य भौंहों से, सफेद नूतन पत्तों के तुल्य ललाट से और फूलों के तुल्य ओठों स…
  7. Verse 10वक्ष स्थलरूपी सरोवर में सटे हुए स्तनरूपी कमल की कलियों से यह युक्त है। इसमें स्कन्धरूपी क…
  8. Verse 11इसमें उदर रूपी गर्त में रक्खे हुए अपने प्रारब्ध से प्राप्त अन्न ही धन, अन्न, धान्यआदि ओर…
  9. Verse 12हृदय में स्थित विचाररूपी जौहरियों द्वारा परीक्षा करके खरीदे गये ओर चक्षु आदि द्वारा प्राप…
  10. Verse 13मुख में हाथी के दाँत के एक भाग की तरह थोड़े देखे गये दाँत रूपी हड्डी के टुकड़ों से यह व्य…
  11. Verse 14यह रोमरूपी लम्बे-लम्बे तृणों से आच्छादित है । कान का गर्त ही इसमें कुआँ है । कटिपृष्ठभागर…
  12. Verse 15इसमें मूत्रस्थानरूपी घटीयन्त्र के प्रान्तप्रदेश में गुदाद्रार से निकलने वाला मलरूपी कीचड़…
  13. Verses 16–17इसमें बुद्धिरूपी रस्सी से चपल इन्द्रियरूपी बन्दर वैधे हँ । बदनरूपी उद्यान के हास्यरूपी पु…
  14. Verse 18अज्ञानी की यह देह अनन्त दुःखों की खान है, परन्तु ज्ञानी की देह अनन्त सुखो की खान हे
  15. Verse 19यह शरीररूपी महानगर ज्ञानी के अनन्तसुख के लिए है, यह जो कहा था, उसीको विशद करते हैं । हे श…
  16. Verse 20ज्ञानी इसमें बैठकर संसार मेँ सम्पूर्ण भोग और मोक्ष के लिए खूब विहार करता है, इसलिए यह ज्ञ…
  17. Verse 21शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गन्ध आदि विषय, बन्धु-बान्धव और मोक्ष इसी शरीररूपी महानगरी से प्राप…
  18. Verse 22यह सुख-दुःखमय क्रियाओं का जाल स्वयं धारण करती है, इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, यह सर्वज्ञ के…
  19. Verse 23जैसे इन्द्र अपनी नगरी में निश्चिन्त होकर राज्य करता हे, वैसे ही उस शरीररूपी नगरी में राज्…
  20. Verse 24वह योनिगर्त में ही पराक्रमवाले काम के विषय मेँ मनरूपी मत्त घोडे को प्रेरित नहीं करता । लो…
  21. Verse 25अज्ञानरूपी परराष्टू उसके छिद्र को नहीं देखता और वह संसाररूपी शत्रु के भय के मूल स्नेहो को…
  22. Verse 26काम-भोगरूपी दुष्टग्राह से युक्त सुखलेश रूपी दुःखों से रुलानेवाले इस तृष्णा नदी के प्रवाह…
  23. Verse 27वह मानस ब्रह्माकारवृत्ति मेँ आरूढ होकर बाहर और भीतर परमात्मा के दर्शन से आधिभौतिक और आध्य…
  24. Verse 28इन्द्रियरूपी सब लोगों से आपाततः देखे जानेवाले विषयों में सुख की दृष्टि से विमुख हुआ वह ध्…
  25. Verse 29जैसे इन्द्र की अमरावती नगरी सुखदायक ओर भोग-मोक्षप्रद है, वैसे ही तत्त्ववेत्ता की यह देहरू…
  26. Verse 30जिस बडी भारी देहरूपी नगरी के रहने से सब यानी भोगमोक्ष स्थित रहता है और नष्ट होने से कुछ न…
  27. Verse 31जैसे घड़े के नष्ट होने पर जिसने घटाकाश को अपने में मिला लिया, ऐसे आकाश का कुछ भी नष्ट नही…
  28. Verse 32जिस शरीररूपी नगरी का विद्यमान दशा में भी भलीभोति स्पर्श नहीं होता, उसका नाश होने पर स्पर्…
  29. Verse 33सर्वव्यापक होकर भी इस शरीररूपी महानगरी में स्थित हुआ आत्मारूपी पुरुष विश्व के द्वारा रचे…
  30. Verse 34व्यवहार दृष्टि से कर्म करता हुआ भी परमार्थ दृष्टि से कुछ न करता हुआ समस्त पदार्थो की क्रि…
  31. Verse 35उसकी देहनगरी में कान्तादिभोगरूप फल कहते हैं। अव्याहतगति यह आत्मा कभी भोगकौतुकवाले निर्मल…
  32. Verse 36उक्त शरीररूपी महानगरी में स्थित हुआ वह हृदयकमल में आरूढ़ होकर सदा शीतल शरीरवाली लोकमनोहर…
  33. Verses 37–38जैसे चन्द्रमा के दोनों बगलों मे दो विशाखा ताराएँ चित्त को प्रसन्न करनेवाली स्थित रहती हैं…
  34. Verse 39जैसे स्वर्गीय लोग नारकीय लोगों के दुःख को देखते हैं वैसे ही ज्ञानी अज्ञानियों के दुःख को…
  35. Verse 40विविध भोगों का यद्यपि वह सेवन करता है, तथापि वे इसके पुनर्जन्म आदि दुःख के लिए नहीं होते…
  36. Verse 41यह नश्वर है, क्षणिक है, यों पहले ज्ञात होकर उपभुक्त हुआ भोग तृप्तिदायक होता है, शत्रुता क…
  37. Verse 42समाज का विघटन होने पर दूर जानेवाले समाज के नरनारीरूपी नटों के समूह की यात्रा के समान इस स…
  38. Verse 43जैसे बटोही लोगों को अवान्तर ग्राम की यात्रा अतर्कित प्राप्त होती है, वैसे ही अज्ञानी लोग…
  39. Verse 44जैसे बिना किसी यत्न के बनाये हुए पर्वत, वन, तालाब आदि में स्थित पेड़, झाड़ी, कमल आदि पदार…
  40. Verse 45यदि ऐसा है, तो ज्ञानी प्रवृत्ति मे क्यों पडता है ? इस पर कहते हैं। इन्द्रियों को प्रारब्ध…
  41. Verse 46क्यों ऐसा करता है ? इस पर कहते हैं। जैसे पर्वत को चंचल मोरपंख के आघात नहीं कँपाते हैं, वै…
  42. Verse 47सम्पूर्ण सन्देहों के कारण अज्ञान के नष्ट होने से ही जिसके सम्पूर्णं सन्देह शान्त हो गये ह…
  43. Verse 48पामरों की दृष्टि से स्वराज्य दृष्टान्त हो सकता है, तत्त्वज्ञ की दृष्टि से तो वह दृष्टान्त…
  44. Verse 49जैसे शान्तपुरुष मत्तो का उपहास करता है, वैसे ही प्रशान्तचित्त ज्ञानी पुरुष भोगों की इच्छा…
  45. Verse 50जैसे अन्य के द्वारा परित्यक्त सत्री की इच्छा कर रहे पुरुष की प्रवृत्ति का अन्य पुरुष उपहा…
  46. Verse 51यदि कोई शंका करे जिसका ज्ञान परिपक्व नहीं हुआ, ऐसा पुरूष विषयों में दौड़ रहे मन का निग्रह…
  47. Verse 52जो भोगतृष्णा मनोवृत्ति का भोगों में प्रसार करती है, जैसे विष वृक्ष के अंकुरोद्रम का ही वि…
  48. Verse 53यदि कोई कहे दण्ड देने से पीड़ित हुआ मन रुठे हुए बालक की नाई आत्मा मेँ भी अनुरक्त नहीं होग…
  49. Verse 54उक्त भाव को ही पुनः विशद करते है । जैसे भरी हुई नदियों का वर्षाकाल का थोडा सा प्रवाह सुशो…
  50. Verse 55परिपूर्ण हुआ भी प्राकृत पुरुष फिर भी अधिक की इच्छा करता ह । संसार के भरने योग्य जलवाला सम…
  51. Verse 56खूब निगृहीत हुए मन की पीछे भिक्षा जलादि विषयों के अर्पण से थोडी बहुत जो लालना है, उसी थोड…
  52. Verse 57उक्त अर्थ में दृष्टान्त कहते हैं। बन्धन से युक्त हुआ राजा एक कौर भोजन से भी सन्तुष्ट हो ज…
  53. Verse 58इसलिए चिरकाल के निग्रह से ओर तत्त्वबोध से समूल मन की जय के लिए पहले इन्द्रिय जय ही सम्पूर…
  54. Verse 59केवल मन पर विजय पाने के लिए ही नहीं, बाह्य शत्रुओं के ऊपर जय पाने के लिए भी डन्द्रियों पर…
  55. Verse 60जिसने मन पर विजय प्राप्त की है, उसकी प्रशंसा ओर वन्दना द्वारा इन्द्रिय निग्रह के फलरूपः म…
  56. Verse 61हृदयरूपी बिल में की गई कुण्डलाकार कल्पना से गर्वीला हुआ मनरूपी अजगर जिस पुरुष का शान्त हो…